41 साल के राजनीतिक कैरियर में कैप्टन ने देखे कई मुश्किल दौर

 
J

चंडीगढ़: अमरिंदर सिंह के लिए पार्टी में चल रही सियासी उठापटक नई नहीं है। 41 साल के अपने राजनीतिक करियर में पहले भी वह कई मुश्किल दौर से उबर चुके हैं। संगठन के दिग्गज खासकर पार्टी प्रधानों से हमेशा ही कैप्टन का 36 का आंकड़ा रहा है। इन सबके बाद भी पार्टी आलाकमान कैप्टन पर ही विश्वास जताता रहा। 2002 और 2017 में कैप्टन अपनी अहमियत आलाकमान को दिखा भी चुके हैं।

सियासत से खास वास्ता नहीं रखने वाले कैप्टन अमरिंदर को पहला राजनीतिक पाठ उनके स्कूली दिनों के दोस्त राजीव गांधी ने 1980 में कांग्रेस में लाकर पढ़ाया था। उसी साल कैप्टन ने पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीतकर आए। 1984 में कांग्रेस से सशस्त्र चरमपंथियों को लेकर उनकी बात बिगड़ गई और उन्होंने संसद और कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। राजनीतिक कैरियर में उनके इस कठिन फैसले से उन्हें मुश्किल में डाल दिया, लेकिन एक साल के संघर्ष के बाद अगस्त 1985 में कैप्टन शिरोमणि अकाली दल में शामिल हो गए। विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत कर सुरजीत सिंह बरनाला की सरकार में मंत्री बन गए।

आतंकवाद के इस कठिन दौर में 1987 में बरनाला सरकार को बर्खास्त कर केंद्र ने पंजाब में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। पांच साल के बाद वर्ष 1992 में अमरिंदर सिंह शिअद से भी अलग हो गए। इसके बाद उन्होंने एक अलग दल अकाली दल (पंथिक) का गठन किया। 1998 से इस दल का कांग्रेस में विलय कर दिया गया।

1980 से राजनीति में स्थायी ठिकाना ढूंढ़ रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह को 1998 में सियासी ऊंचाई मिली। कांग्रेस आलाकमान ने कैप्टन को पंजाब में कांग्रेस संगठन की कमान सौंप दी। आपातकाल और आतंकवाद के बुरे दौर से गुजरी कांग्रेस को कैप्टन ने फिर से खड़ा किया। 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में अमरिंदर के नेतृत्व में कांग्रेस को जीत हासिल हुई।

2002 में कांग्रेस की सरकार में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का पहला विरोध उस समय की उपमुख्यमंत्री राजिंदर कौर भट्टल ने शुरू किया। दोनों के बीच कई फैसलों पर आपसी खींचतान चलती रही। वहीं पंजाब कांग्रेस के प्रधान प्रताप बाजवा, शमशेर सिंह दूलो और लाल सिंह से भी कैप्टन के संबंध अच्छे नहीं रहे।

पंजाब में सियासत की धुरी माने जाने वाले किसानों के लिए कैप्टन हमेशा ही खड़े रहे। 2002 में सरकार बनने के बाद बतौर मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कई फैसले किसानों के हित में लिए। इस दौरान सबसे महत्वपूर्ण फैसला नदियों से पानी के बंटवारे के मामले पर लिया। हालांकि 2007 में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई, लेकिन इसके बाद भी आलाकमान ने कैप्टन को दो बार प्रधान बनाकर अपना विश्वास दिखाया।

2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अमृतसर से भाजपा नेता अरुण जेटली को एक लाख से अधिक वोटों से हराया। इसके बाद कांग्रेस ने कैप्टन को लोकसभा में पार्टी के संसदीय दल का उपनेता नियुक्त किया, लेकिन अमरिंदर का दिल पंजाब में ही लगा रहा। उनके मन को देखते हुए आलाकमान ने 2017 में फिर से पटियाला के महाराज पर दांव खेला और बाजी अपने पक्ष में कर ली।

वर्तमान में पंजाब कांग्रेस के हालातों के लिए कैप्टन की दिल्ली में कमजोर पैरवी को माना जा रहा है। दिल्ली में कैप्टन के कमजोर होने की एक बड़ी वजह यह भी है कि कैप्टन की पैरवी करने वाले कांग्रेसी दिग्गज अब नहीं रहे। कैप्टन को सबसे बड़ा नुकसान सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल की मौत से हुआ। कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा के नहीं होने से भी कैप्टन की पैरवी कमजोर पड़ी। ये दोनों एक सोच के नेता थे। अब दिल्ली में नए चेहरों की एंट्री हो गई है, जिससे लगातार समीकरण बदल रहे हैं।