यूपी में अंदरूनी कलह जोरों पर कांग्रेस नेताओं के बीच…

लखनऊ । उत्तर प्रदेश (यूपी) में साल 2022 की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए जहां सभी राजनीतिक दलों ने तैयारियां करनी शुरू कर दी है और चीजों को व्यविस्थत करने में लगे हैं, वहीं यूपी में कांग्रेस खुद से ही लड़ने में व्यस्त है। पार्टी के भीतर अंदरूनी कलह जोरों पर है। पिछले हफ्ते हुई कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की बैठक के बाद, जहां पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं द्वारा लिखे गए एक पत्र ने भारी विवाद खड़ा कर दिया था, पार्टी आलाकमान के प्रति अपनी निष्ठा जताने के लिए अब कांग्रेस के नेता ‘असंतुष्टों’ को निशाना बना रहे हैं।

सबसे पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद को निशाने पर लिया गया। लखीमपुर खीरी इकाई ने विवादास्पद पत्र पर हस्ताक्षरकर्ता करने के लिए पार्टी से उनके निष्कासन की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया।

डीसीसी प्रमुख प्रहलाद पटेल ने दावा किया कि यह राज्यस्तरीय कांग्रेस नेतृत्व के एक पदाधिकारी के दबाव में पारित किया गया।

बगावत की आग की लपटों को बुझाने के बजाय, यूपीसीसी नेतृत्व ने इस मुद्दे पर जानबूझकर चुप्पी साध रखी है। दो स्थानीय कांग्रेस नेताओं के बीच बातचीत के एक असत्यापित ऑडियो क्लिप से पता चला कि प्रसाद के खिलाफ प्रदर्शन एक वरिष्ठ पार्टी नेता के इशारे पर किया गया था और कुछ मजदूरों को नारे लगाने के लिए भाड़े पर लिया गया था।

यूपीसीसी के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने दिलचस्प रूप से इस मामले में पार्टी का बचाव करते हुए कहा कि पार्टी के कुछ कार्यकर्ता अपनी भावनाओं को पार्टी आलाकमान तक पहुंचाना चाहते हैं।

इसके तुरंत बाद, पूर्व कांग्रेस एमएलसी नसीब पठान ने एक वीडियो संदेश डाला, जिसमें दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद को पार्टी से बाहर करने की मांग की गई थी। पठान ने कहा, “जैसा कि उन्होंने पार्टी के अनुशासन को तोड़ा है, उन्हें ‘आजाद’ कर दिया जाना चाहिए और पार्टी से निकाल दिया जाना चाहिए।”

नसीब पठान संयोग से, एक समय यूपी कांग्रेस में आजाद के कट्टर वफादारों में से एक हुआ करते थे।

अब, उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष निर्मल खत्री ने आजाद पर उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को कांग्रेस-समाजवादी पार्टी गठबंधन के लिए मजबूर करने का आरोप लगाया है। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस मात्र सात सीटें जीत सकी थी।

खत्री ने सोशल मीडिया पर आजाद पर निशाना साधते हुए कहा, “जहां तक मुझे पता है, राहुल गांधी भी गठबंधन के विरोध में थे, लेकिन आजाद की अड़ियल और पराजयवादी राजनीतिक सोच के कारण शायद चुप रहे। राजनीति विज्ञान के उनके सिद्धांत गठबंधन की राजनीति पर केंद्रित हैं।”

यूपीसीसी के पूर्व प्रमुख ने कहा, “आजाद ने अपने साक्षात्कार में कहा था कि पिछले 23 सालों से कांग्रेस कार्यकारिणी समिति (सीडब्ल्यूसी) का चुनाव नहीं हुआ है। सवाल यह है कि जब इन 23 सालों में वह समिति के खुद एक मनोनीत सदस्य थे, तब उन्होंने सवाल क्यों नहीं उठाया?”

खत्री ने कहा, “मुझे यह भी लगता है कि चुनाव हर स्तर पर होने चाहिए। लेकिन, आप जैसे नेताओं का मानना था कि नामांकन का तरीका बेहतर है।”

इसके अलावा, युवा कांग्रेस नेताओं का एक समूह पहले से ही समावेशी आधार पर पार्टी की विफलता को लेकर राज्य के नेतृत्व पर निशाना साध रहा है।

इन नेताओं ने अपने व्हाट्सएप ग्रुप में, यूपीसीसी प्रमुख पर ऊंची जातियों की अनदेखी करने और पार्टी में ओबीसी को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।

इन नेताओं का यह भी दावा है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को उनके सहयोगी यूपी कांग्रेस की स्थिति के बारे में गुमराह कर रहे हैं।

इस बीच, पार्टी ने 10 वरिष्ठ नेताओं के निष्कासन को रद्द करने में कोई रुचि नहीं दिखाई है, हालांकि यह उल्लेखनीय है कि कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हाल ही में पार्टी के वरिष्ठ नेता शकील अहमद के निष्कासन को रद्द कर दिया था।

गौरतलब है कि बिहार में मधुबनी से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ने के बाद अहमद को पिछले साल कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया था। हालांकि अब कांग्रेस में उनकी वापसी हो गई है।

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