विश्लेषण: राजनीति के लिए बाहुबली जरूरी या मजबूरी

दागी प्रत्याशियों पर सुप्रीम कोर्ट ने भले ही सख्त रुख अपनाया हो लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इसका कोई खास असर नहीं होने वाला है। जब तक राजनीतिक दल इच्छाशक्ति नहीं दिखाएंगे और कड़े कानून नहीं बनेंगे तब तक ऐसे ही दागी चुनाव मैदान में उतरते रहेंगे और जीतकर जनप्रतिनिधि भी बनते रहेंगे। प्रत्याशियों को चुनने के पीछे कारण बताने के अदालती आदेश के बावजूद राजनीति के अपराधीकरण पर लगाम लगना आसान नजर नहीं आता है। इसका सबसे बड़ा कारण है कड़े कानूनों का अभाव होना। जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा आठ दोषी राजनेताओं को चुनाव लड़ने से तो रोकती है। लेकिन ऐसे नेता जिन पर केवल मुकदमा चल रहा है,  वे चुनाव लड़ने को स्वतंत्र हैं। भले ही उनके ऊपर लगा आरोप कितना भी गंभीर क्यों न हो।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राजनीतिक दलों को सिर्फ आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवार को चुनने का कारण आयोग को बताना है और बस। उसके बाद कुछ नहीं। ऐसे दागी उम्मीदवारों को चुनने के लिए जनता पर दोष नहीं डाला जा सकता। दागियों के नाम पर मुहर उनकी मजबूरी है। अगर बड़े दल दागी उम्मीदवारों को टिकट देंगे तो जनता के सामने कोई विकल्प ही नहीं बचता है, क्योंकि बड़े चुनावों में ज्यादातर लोग अपने झुकाव वाले दल या पसंदीदा नेता के आधार पर मतदान करते हैं।

चुनाव विश्लेषण संस्था एडीआर के संस्थापक जगदीप छोकर कहते हैं उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड का ब्योरा पिछले 18 वर्षों से सार्वजनिक हो रहा है। उच्चतम न्यायालय ने 2002 में ही निर्देश दिया था कि यह ब्योरा आयोग को दिया जाना चाहिए। इसके बाद 2018 में अदालत की पांच जज की पीठ ने भी यही आदेश दिया कि आपराधिक रिकॉर्ड का ब्योरा अखबारों और वेबसाइटों पर प्रकाशित किया जाए। वह आगे कहते हैं, इससे हुआ क्या, 2019 के आम चुनावों में आपराधिक रिकॉर्ड वाले सांसदों की संख्या बढ़ गई। मैं नहीं समझ पा रहा कि इस आदेश से राजनीति का शुद्धीकरण कैसे होगा। निर्वाचन आयोग स्वयं आपराधिक पृष्ठभूमि की घोषणा करने में विफल रहने वाले प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों को संविधान के अनुच्छेद-324 के तहत दंडित करने के सुझाव से सहमत नहीं है। जब कोई दांडिक प्रावधान नहीं है तो क्या होने वाला है, मेरा जवाब है, कुछ नहीं।

छोकर ने कहा कि अदालत को इस बारे में सख्त आदेश देना चाहिए था कि जिन उम्मीदवारों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं उन्हें राजनीति में न आने दिया जाए। यह आदेश सर्वोच्च अदालत ने नहीं दिया है तो फिर कोई फायदा नहीं। लेकिन सवाल यह भी है जब तक कोई दोषी साबित न हो जाए उसे निर्देष ही कहा जाता है। यह आपराधिक न्याय का सिद्धांत है। होना यह चाहिए था कि अदालत आयोग के उस सुझाव को मान लेता कि जिसके खिलाफ दो साल से ज्यादा की सजा वाले संज्ञेय अपराधों में अदालत में आरोप तय हो गए हों उन्हें चुनाव लड़ने से वंचित किया जाए। निर्वाचन आयोग ने यह सुझाव लगभग चार बार केंद्र सरकार को भेजा है लेकिन सरकार ने इस पर कोई फैसला नहीं लिया है।

एडीआर संस्थापक ने उदाहरण दिया कि अन्य देशों में जिसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा होता है, वो चुनाव लड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकता। लेकिन यहां राजनीतिक दलों ने टिकट देने का सिर्फ एक ही आधार बना रखा है कि वह जिताऊ उम्मीदवार है या नहीं। दलों को लगता है कि प्रत्याशी जीत सकता है कि वो उसे टिकट दे देते हैं फिर चाहे उस पर कितने ही मुकदमे क्यों न हों।

जानें क्या है राज्यों का हाल

बिहार : 59 फीसदी विधायकों पर केस
बिहार विधानसभा चुनाव 2015 की बात करें तो  कुल 243 सीटों में से 143 यानी (59 फीसदी) चुनाव जीते विधायक आपराधिक रिकॉर्ड वाले थे। 96 विधायकों पर हत्या, अपहरण जैसे गंभीर आपराधिक मामले थे।  इनमें 12 पर हत्या और 26 पर हत्या के प्रयास का मामला था। इनमें राजद के 49 और जदयू के 37 विधायक शामिल हैं। प्रत्याशियों की बात करें तो 3450 प्रत्याशियों में से 1038 पर (30 फीसदी) पर आपराधिक मामले दर्ज थे।

– 12 पर हत्या और 26 पर हत्या के प्रयास का मामला था
– 796 पर गंभीर प्रकृति के अपराध थे

यूपी : एक तिहाई से ज्यादा आपराधिक छवि वाले
एडीआर की मार्च 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश के 403 विधायकों में से 143 विधायक (36 फीसदी) दागी हैं। इसमें 83 भाजपा, 11 सपा, चार बसपा और एक कांग्रेस से हैं। जबकि मई 2019 में यूपी से चुने गए 79 सांसदों (एक छोड़कर) में से 44 यानी 56 प्रतिशत सांसदों ने आपराधिक मामले हैं। जबकि 2014 में 80 में से 28 यानी 35 प्रतिशत सांसद दागी थे। 37 यानी 47 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ हत्या,  महिलाओं पर अत्याचार जैसे गंभीर मामले हैं।
– 36  फीसदी दागी हैं प्रदेश में 403 विधायकों में

उत्तराखंड : 15 फीसदी प्रत्याशी दागी थे
एडीआर रिपोर्ट के मुताबिक 2017 के विधानसभा चुनाव में कुल 637 प्रत्याशियों में से 91 पर आपराधिक मामले दर्ज थे, इसमें से 54  पर हत्या, अपहरण, महिला उत्पीड़न, डकैती जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमे शामिल थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में कुल 52 में से 05 प्रत्याशियों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज पाए गए। राज्य कैबिनेट में शिक्षा मंत्री अरविंद पाण्डेय पर निर्वाचन के समय हत्या, डकैती जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज थे।
– 637 प्रत्याशियों में से 91 पर आपराधिक मामले दर्ज थे
– 54  पर हत्या, अपहरण, जैसे गंभीर मुकदमे

झारखंड : तीन विधायकों को सजा
पिछले विधानसभा चुनाव में 335 दागी प्रत्याशी मैदान में थे। इनमें से 44 उम्मीदवार चुनाव जीते हैं। पिछली विधानसभा के तीन विधायकों की विधायकी सजायाफ्ता होने के कारण चली गई थी। सिल्ली से झामुमो विधायक अमित महतो को मारपीट के आरोप में दो साल की सजा सुनाई गई और उनकी विधायकी चली गई।

26 साल बाद भी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं 
राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण और नेता-अफसर और पुलिस के गठजोड़ पर वोहरा समिति की रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई है। नरसिंह राव सरकार के समय गठित नरेंद्र नाथ वोहरा समिति ने अक्तूबर 1993 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी, लेकिन इसके 100 में से 12 पेज को ही सार्वजनिक किया गया है। रिपोर्ट पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह दलील दी कि रिपोर्ट सार्वजनिक करने के लिए उसे बाध्य नहीं किया जा सकता। यह रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है।

फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का निर्देश
– 12 फास्टट्रैक कोर्ट बनाने का निर्देश दिया गया 14 दिसंबर 2017 को ऐसे मामलों में
– 01 मार्च 2018 तक बनानी थी ऐसी अदालतें सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार
– 02 ऐसे अदालतें दिल्ली-एनसीआर में, यूपी, बिहार, एमपी, महाराष्ट्र आदि में

आधे मामले ही फास्ट ट्रैक
– 1233 मामले (40 फीसदी) फास्टट्रैक कोर्ट को भेजे गए
– 136 मामलों (11 फीसदी) में सजा सुनाई गई
– 1097 मामलों में अभी भी चल रही है सुनवाई
(23 सितंबर 2018 तक के आंकड़े)

सजा की दर छह फीसदी
जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मामलों में सजा की दर महज छह फीसदी है। यह जानकारी केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में 11 सितंबर 2018 को दाखिल हलफनामे में दी थी।

– 3884  केस लंबित सांसदों-विधायकों पर
– 38 में सजा हुई, 560 बरी कर दिए गए
– 48  मामलों में सारे जनप्रतिनिधि रिहा बिहार में
– 05 मामलों में सजा यूपी के जनप्रतिनिधियों को
– 147  बरी और आठ को सजा केरल में हुई

लोकसभा में भी बढ़ रही संख्या

2019
– 233 यानी 43 फीसदी सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज
– 29 फीसदी मामले दुष्कर्म, हत्या, हत्या के प्रयास जैसी गंभीर प्रकृति के

2014
– 185 लोकसभा सांसदों (34 फीसदी) पर आपराधिक मुकदमे दर्ज
– 112 पर गंभीर प्रकृति के मामले चल रहे

2009
– 162 सांसदों (करीब 30 फीसदी) पर मुकदमे दर्ज
– 14 फीसदी पर  सांसदों पर गंभीर मामलों में केस दर्ज

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