पशुपतिनाथ मंदिर: किसी जन्म नहीं मिलती पशु योनी यहां दर्शन करने के बाद

विश्व में दो पशुपतिनाथ मंदिर प्रसिद्ध हैं एक नेपाल के काठमांडू और दूसरा भारत के मंदसौर का। दोनों ही मंदिर में समान आकृति वाली मुर्तियां स्थापित हैं। नेपाल का पशुपतिनाथ मंदिर एक प्रसिद्ध और पवित्र हिंदू मंदिर परिसर है, जो नेपाल की राजधानी काठमांडू घाटी के पूर्वी भाग में काठमांडू से लगभग 5 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में बागमती नदी के तट पर स्थित है।

पशुपतिनाथ भगवान शिव को समर्पित एशिया के चार सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक है। यह मंदिर 5 वीं शताब्दी में निर्मित और बाद में मल्ल राजाओं द्वारा पुनर्निर्मित किया गया था। पशुपतिनाथ मंदिर के मुख्य शिवालय शैली में एक सोने की छत, चार तरफ से ढकी हुई चांदी और बेहतरीन गुणवत्ता की लकड़ी की नक्काशी है। कई अन्य हिंदू और बौद्ध देवताओं को समर्पित मंदिर पशुपतिनाथ के मंदिर के आसपास हैं। पशुपतिनाथ मंदिर काठमांडू घाटी के 8 यूनेस्को सांस्कृतिक विरासत स्थलों में से एक है।

यह एक श्मशान स्थल भी है, जहां हिंदुओं का अंतिम संस्कार किया जाता है।हिन्दुओं का दाह संस्कार नदी के किनारे बने प्लेटफार्मों पर होता है। खास बात यह है कि मुख्य मंदिर के द्वार के अंदर केवल हिंदुओं को जाने की अनुमति है। आंतरिक गर्भगृह में एक शिव लिंगम है और इसके बाहर नंदी बैल, शिव के वाहन की सबसे बड़ी मूर्ति स्थापित हैं। पशुपतिनाथ के मंदिर में लगभग 492 मंदिर, 15 शिवालय और 12 ज्योतिर्लिंग (फालिक तीर्थ) हैं।

मान्यता
मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस स्थान के दर्शन करता है उसे किसी भी जन्म में फिर कभी पशु योनि प्राप्त नहीं होती है। हालांकि शर्त यह है कि पहले शिवलिंग के पहले नंदी के दर्शन न करें। मंदिर में अगर कोई घंटा-आधा घंटा ध्यान करता है तो वह जीव कई प्रकार की समस्याओं से मुक्त भी हो जाता है।

पौराणिक कथा
तीसरी कथा भारत के उत्तराखंड राज्य से जुड़ी एक पौराणिक कथा से है। इस कथा के अनुसार इस मंदिर का संबंध केदारनाथ मंदिर से है। कहा जाता है जब पांडवों को स्वर्गप्रयाण के समय शिवजी ने भैंसे के स्वरूप में दर्शन दिए थे जो बाद में धरती में समा गए लेकिन पूर्णतः समाने से पूर्व भीम ने उनकी पुंछ पकड़ ली थी। जिस स्थान पर भीम ने इस कार्य को किया था उसे वर्तमान में केदारनाथ धाम के नाम से जाना जाता है। वहीं, जिस स्थान पर उनका मुख धरती से बाहर आया उसे पशुपतिनाथ कहा जाता है। पुराणों में पंचकेदार की कथा नाम से इस कथा का विस्तार से उल्लेख मिलता है।

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