Nag Panchami 2019 : कल है नागपंचमी का पर्व, जानिए पूजन विधि कालसर्प दोष की शांति की

श्रावण माह का तीसरा सोमवार अतिविशिष्ट संयोग वाला है। इस दिन नागपंचमी का पर्व मनाया जाएगा। हस्त नक्षत्र में पड़ने वाली नागपंचती के दिन सिद्ध मुहूर्त में कालसर्प दोष की शांति के लिए पूजन करना कल्याणकारी माना जाता है।

बालाजी ज्योतिष संस्थान के पं. राजीव शर्मा ने बताया कि इस दिन गोचर में भी काल सर्प योग बन रहा है और इसे ज्योतिष गणना में अद्भुत संयोग माना जाता है।

पं. ने बताया कि अग्नि पुराण में लगभग 80 प्रकार के नागों का वर्णन मिलता है। इसमें अनंत, वासुकि, पदम, महापध, तक्षक, कुलिक और शंखपाल प्रमुख माने गए हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार राहु के जन्म नक्षत्र भरणी के देवता काल हैं और केतु के जन्म नक्षत्र के के देवता सर्प हैं। अत: राहु-केतु के जन्म नक्षत्र देवताओं के नामों को जोड़कर कालसर्प योग कहा जाता है। राशि चक्त्र में 12 राशियां हैं,जन्म पत्रिका में 12 भाव हैं एवं 12 लग्न हैं। इस तरह कुल 288 काल सर्प योग घटित होते हैं। इस बार नाग पंचमी खास है। वर्षों बाद ऐसा योग बन रहा है इसमें नागपंचमी सोमवार को हस्त नक्षत्र, सिद्ध योग, अमृत योग तथा कन्या के चंद्र में मनाई जाएगी। इस बार नाग पंचमी पर हस्त नक्षत्र में काल-सर्प योग होना विशेष संयोग है। काल-सर्प दोष निवारण के लिए यह विशिष्ट दिन है। नाग पंचमी के सिध्द मुहूर्त में काल-सर्प शांति कराना अति उत्तम रहेगा।

गोचर में कालसर्प योग की तिथियां- 30 जुलाई को प्रात: 5:40 बजे से 13 अगस्त को प्रात: 5:30 बजे तक, 26 अगस्त को शाम 5:30 से 9 सितंबर को प्रात: 6:30 बजे तक, 22 सितंबर को शाम 6 बजे से 6 अक्तूबर को रात 9:35 बजे तक, 20 अक्तूबर को भोर 4:10 बजे से 1 नवंबर को प्रात: 5:30 बजे तक और 16 नवंबर को प्रात: 5:30 बजे से 30 नवंबर को रात 3:30 बजे तक।

ऐसे करें कालसर्प की शांति पूजा : सुबह स्नान के बाद पूजा के स्थान पर कुश का आसन स्थापित करके हाथ में जल लेकर अपने ऊपर और पूजन सामग्री पर छिड़कना चाहिए। फिर संकल्प लेकर कि मैं कालसर्प दोष शांति हेतु यह पूजा कर रहा हूं। अत: मेरे सभी कष्टों का निवारण कर मुझे कालसर्प दोष से मुक्त करें। तत्पश्चात अपने सामने चौकी पर एक कलश स्थापित कर पूजा आरम्भ करें। कलश पर एक पात्र में सर्प-सर्पनी का यंत्र एवं काल सर्प यंत्र स्थापित करें। साथ ही कलश पर तांबे के तीन सिक्के, तीन कौड़ियां सर्प-सर्पनी के जोड़े के साथ रखें। उस पर केसर का तिलक लगाएं, अक्षत चढ़ाएं, पुष्प अर्पित करें तथा काले तिल, चावल व उड़द को पकाकर शक्कर मिलाकर उसका भोग लगाएं। फिर घी का दीपक जलाकर मंत्रोच्चार करना चाहिए।

 

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